सत्संग माधुरी

सत्संग माधुरी

यह सत्संग माधुरी श्रृंखला, कई दोहो क संग्रह है। इन दोहों को मैंने स्वयं के अनुभव, गुरूजनों के उपदेश तथा शास्त्र के आधार पर संकलित किया है। इसमें अध्यात्मक के विषयों को दोहों के माध्यम से आसान बनाकर प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। इसके लिखने तथा वाचन का प्रमुख उद्येश्य स्वयं का आध्यात्मिक उत्थान, जन-कल्याण और ईश्वर सेवा की भावना निहित है। आशा है आपको मेरा यह प्रयास पसंद आएगा।
00:00
00:00

Episodes

7-

दोहा 07:- मण, माणिक, मुक्ता उपजे, सर्प, पर्वत, गज माथ। शोभा ग्रंथन तब कहें, जब सुने-सुनायें मिल साथ।।

09 Oct 2019
6-

दोहा 06:- दूसरों में दोष देखना, हो जाता है पाप। स्वयं मन मैला करें, दूजों में रहे डाल।।

23 Sep 2019
5-

दोहा 05:- भव-सागर अमृत-विष निकले, दोनो का है मान। संत पुरूष अमृत जैसे, दुष्ट दारूण विष समान।।

10 Sep 2019
4-

दोहा 04: अगर न जा पाओ, काशी, मथुरा, अगर न कर पाओ गंग-स्नान। संत-प्रयाग सर्व-सुलभ है, डुबकी मार, हो कल्याण।

10 Sep 2019
3-

दोहा 03: पारसपर्श लौह कुन्दन बनें, शोभा तन निखार। दुर्जन सत्संग सज्जन बनें, सेवा समाज सुधार।।

10 Sep 2019