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7-
दोहा 07:- मण, माणिक, मुक्ता उपजे, सर्प, पर्वत, गज माथ। शोभा ग्रंथन तब कहें, जब सुने-सुनायें मिल साथ।।
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6-
दोहा 06:- दूसरों में दोष देखना, हो जाता है पाप। स्वयं मन मैला करें, दूजों में रहे डाल।।
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5-
दोहा 05:- भव-सागर अमृत-विष निकले, दोनो का है मान। संत पुरूष अमृत जैसे, दुष्ट दारूण विष समान।।
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4-
दोहा 04: अगर न जा पाओ, काशी, मथुरा, अगर न कर पाओ गंग-स्नान। संत-प्रयाग सर्व-सुलभ है, डुबकी मार, हो कल्याण।
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3-