1197 - Zara Zara Sa | Sunita Jain
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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Episodes
1197-
Zara Zara Sa | Sunita Jain
Listened
1196-
Yehi hai Saadgi | Pablo Neruda | Translation - Prabhati Nautiyal
Listened
1195-
Abhida Ki Ek Sham | Vivek Nirala
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1194-
Prakriya | Kedarnath Singh
Listened
1193-