Episode's summary
सामाजिक वर्गीकरण और उनसे संबंधित कर्मों को उनकी प्रकृति से उत्पन्न गुणों के आधार पर समझना भगवद्गीता के सबसे जटिल पहलुओं में से एक है। यह कठिनाई इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि हम किसी न किसी वर्ण के साथ गहराई से अपनी पहचान जोड़ लेते हैं। निम्नलिखित श्लोक यह स्पष्ट करते हैं कि वर्ण न तो श्रेणीबद्ध हैं और न ही किसी एक को श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए कर्मों में सिद्धि (पूर्णता या मुक्ति) प्राप्त करने की समान क्षमता होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं “स्वकर्म के प्रति समर्पण से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है क्योंकि यह समर्पण उसी परमेश्वर की पूजा है, जिससे सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण सृष्टि व्यापी हुई है” (18.45-18.46)। श्रीकृष्ण ने पहले स्वधर्म (अपने स्वभाव या प्रकृति) की बात की थी और अब वे स्वकर्म का उल्लेख करते हैं। मूलतः, स्वकर्म स्वधर्म से ही उत्पन्न होता है। आज के संदर्भ में, लगभग सभी संस्कृतियों और समाजों में कुछ व्यवसाय -जैसे खेल, अभिनय और गायन -अन्य व्यवसायों की तुलना में अधिक प्रशंसनीय हैं। इसी प्रकार प्राचीन काल में भी महत्व का निर्धारण अन्य मानकों से…
सामाजिक वर्गीकरण और उनसे संबंधित कर्मों को उनकी प्रकृति से उत्पन्न गुणों के आधार पर समझना भगवद्गीता के सबसे जटिल पहलुओं में से एक है। यह कठिनाई इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि हम किसी न किसी वर्ण के साथ गहराई से अपनी पहचान जोड़ लेते हैं। निम्नलिखित श्लोक यह स्पष्ट करते हैं कि वर्ण न तो श्रेणीबद्ध हैं और न ही किसी एक को श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए कर्मों में सिद्धि (पूर्णता या मुक्ति) प्राप्त करने की समान क्षमता होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं “स्वकर्म के प्रति समर्पण से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है क्योंकि यह समर्पण उसी परमेश्वर की पूजा है, जिससे सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण सृष्टि व्यापी हुई है” (18.45-18.46)। श्रीकृष्ण ने पहले स्वधर्म (अपने स्वभाव या प्रकृति) की बात की थी और अब वे स्वकर्म का उल्लेख करते हैं। मूलतः, स्वकर्म स्वधर्म से ही उत्पन्न होता है। आज के संदर्भ में, लगभग सभी संस्कृतियों और समाजों में कुछ व्यवसाय -जैसे खेल, अभिनय और गायन -अन्य व्यवसायों की तुलना में अधिक प्रशंसनीय हैं। इसी प्रकार प्राचीन काल में भी महत्व का निर्धारण अन्य मानकों से…
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245. कर्म ही पूजा है
Listenedसामाजिक वर्गीकरण और उनसे संबंधित कर्मों को उनकी प्रकृति से उत्पन्न गुणों के आधार पर समझना भगवद्गीता के सबसे जटिल पहलुओं में से एक है। यह कठिनाई इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि हम किसी न किसी वर्ण के साथ गहराई से अपनी पहचान जोड़ लेते हैं। निम्नलिखित श्लोक यह स्पष्ट करते हैं कि वर्ण न तो श्रेणीबद्ध हैं और न ही किसी एक को श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए कर्मों में सिद्धि (पूर्णता या मुक्ति) प्राप्त करने की समान क्षमता होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं “स्वकर्म के प्रति समर्पण से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है क्योंकि यह समर्पण उसी परमेश्वर की पूजा है, जिससे सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण सृष्टि व्यापी हुई है” (18.45-18.46)। श्रीकृष्ण ने पहले स्वधर्म (अपने स्वभाव या प्रकृति) की बात की थी और अब वे स्वकर्म का उल्लेख करते हैं। मूलतः, स्वकर्म स्वधर्म से ही उत्पन्न होता है। आज के संदर्भ में, लगभग सभी संस्कृतियों और समाजों में कुछ व्यवसाय -जैसे खेल, अभिनय और गायन -अन्य व्यवसायों की तुलना में अधिक प्रशंसनीय हैं। इसी प्रकार प्राचीन काल में भी महत्व का निर्धारण अन्य मानकों से…
244. वर्गीकरण की विशेषताएँ
Listenedजीवन का विकास, विभाजनों और भिन्नताओं का परिणाम है। किंतुइन विभाजनों के पीछे एक ‘एकत्व’ विद्यमान है जैसे विभिन्न मोतियों को एक सूत्र में पिरोने वाला अदृश्य धागा (7.7)। उद्देश्य यह है कि हम अपने चारों ओर दिखाई देने वाले अव्यवहारिक और तर्कहीन विभाजनों के मध्य उस ‘एकत्व’को अनुभव करने की क्षमता विकसित करें। यह क्षमता ‘एकत्व’ की जागरूकता और अपने कर्मों में संतुलन स्थापित करने के माध्यम से विकसित की जा सकती है (2.38, 6.16)। श्रीकृष्ण ने गुणों और कर्मों के आधार पर समाज के चार वर्गों का उल्लेख किया है। वे कहते हैं “शांति, आत्म-संयम, तपस्या, पवित्रता, धैर्य, सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विवेक और आस्था; ये सब गुण ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक गुण हैं (18.42)। पराक्रम, शक्ति, धैर्य, कौशल, युद्ध से पीछे न हटना, दानशीलता और नेतृत्व क्षमता; ये क्षत्रियों के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक कर्महैं (18.43)। कृषि, गोपालन और वाणिज्य; ये वैश्यों के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक कर्म हैं। सेवा से संबंधित कार्य शूद्रों के स्वाभाविक कर्म हैं”(18.44)। ये वर्गीकरण न तो जन्म पर आधारित हैं, न ही इनमें कोई श्रेणीभेदहै, और न ही ये किसी की…
243. गुण ही विभाजन का कारण हैं
Listenedश्रीकृष्ण कहते हैं “मैंने गुणों और कर्मों के भेद के अनुसार चार वर्णों (विभाजनों) की रचना की है; परंतु मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो (4.13)। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र -ये सब अपने-अपने स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसारकर्म करते हैं” (18.41)। पहली बात, हमारा विभाजनकारी मन हमारे चारों ओर श्रेणियाँ बना लेता है। दूसरी बात, असत्य वास्तव में एक विकृत सत्य के सिवा कुछ नहीं है। इन दोनों के मिलन से यह असत्य धारणा बनी कि सामाजिक वर्ग जन्म पर आधारित और श्रेणीबद्ध हैं। परंतु सच्चाई यह है कि मनुष्य उनके गुणों और कर्मों के कारण चार प्रकार के होते हैं। इसके अतिरिक्त, यह विभाजन किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करने का मापदंड नहीं है। वर्णों या जातियों से संबंधित श्लोकों को समझते समय इन तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिए क्योंकि वर्ण और जाति आज भी हमारे सामाजिक और राजनीतिक ढांचे पर प्रभाव डालते हैं। गुणों का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं “सत्व, रजस् और तमस् -ये तीन गुण आत्मा को शरीर से बाँधते हैं (14.5)। सत्व ज्ञान के प्रति आसक्ति के माध्यम से बाँधता है (14.6)। रजस् जीवात्मा को कर्म के प्रति आसक्ति से बाँधता है (14.7)। तमस्…
242. सभी गुणों से प्रभावित हैं
Listenedश्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में प्रकृति के तीन गुणों -सत्त्व, रजस् और तमस्, का विभिन्न प्रसंगों में विस्तार से वर्णन किया है। वे कहते हैं कि पृथ्वी पर या इस भौतिक जगत् के उच्चतर लोकों में कोई भी जीव ऐसा नहीं है जो इन तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो (18.40)। इसका अर्थ यह है कि किसी भी समय हम किसी न किसी गुण के प्रभाव में रहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं सभी परिस्थितियों में कर्म गुणों द्वारा ही संपन्न होते हैं; परंतु जो व्यक्ति अहंकार से मोहित होता है, वह सोचता है -‘मैं कर्ता हूँ’ (3.27-3.29)। जो ज्ञानी इस सत्य को समझते हैं, वे आसक्त नहीं होते। गुणों में हमेंसम्मोहित कर देने की सूक्ष्म शक्ति होती है और उनके प्रभाव में हम गुणों के कार्यों से ही आसक्त हो जाते हैं। सत्रहवें और अठारहवें अध्यायों मेंगुणों के अनेक कार्यों -जैसे उपासना, आहार, यज्ञ, तप (शरीर, वाणी और मन का), दान, ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति (दृढ़ता) और सुख -का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। श्रीकृष्ण आगे का मार्ग बताते हुए हमें प्रेरित करते हैं कि हम इन तीनों गुणों से ऊपर उठकर गुणातीत बनें -जो सुख और दुःख में समान रहते हैं, आत्मस्थित होते हैं, सुखद और…
241. सुख की रूपरेखा
Listenedहमारे जीवन में सुख और दुःख की द्वैत स्थितियाँ निरन्तर अनुभव होती रहती हैं। श्रीकृष्ण ने कहा है कि जब इन्द्रियाँ अपने विषयों से मिलती हैंतब सुख-दुःख की द्वंद्व अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं (2.14)। प्रशंसा हमें सुख देती है जबकि निन्दा दुःख पहुँचाती है; यद्यपि दोनों ही केवल शब्दों के कानों सेटकराने की घटनाएँ मात्र हैं। इस प्रकार, जीवन इन्द्रियों और इन्द्रिय-विषयों के सतत संपर्क का परिणाम है जिससे स्पष्ट होता है कि सुख-दुःख का द्वंद्व मानवीय अस्तित्व की अपरिहार्य स्थिति है। श्रीकृष्ण सुख को तीन प्रकारों में विभाजित करते हैं जो तीनों गुणों सेउत्पन्न होते हैं (18.36)। वे कहते हैं “जो आरंभ में विष के समान और अन्त में अमृत के समान होता है, उसे सात्त्विक सुख कहा गया है। यह उस बुद्धि की निर्मलता से उत्पन्न होता है जो आत्मज्ञान से प्रकाशित होती है” (18.37)। इस प्रकार, सात्त्विक सुख वही है जैसे मन के लिए ध्यान और शरीर के लिए व्यायाम। प्रारम्भ में इन्हें करना कठिन लगता है और नियमितता बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण होता है परंतु समय के साथ ये मन की शांति और शारीरिक स्वास्थ्य के रूप में गहन और स्थायी आनन्द प्रदान करते हैं।…