Gita Acharan

Gita Acharan

Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.
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Episode's summary

श्रीकृष्ण कहते हैं “प्रत्येक कर्म में कुछ न कुछ दोष अवश्य होता है, जैसे अग्नि धुएँ से आच्छादित होती है; अतः सहज कर्मों को त्यागना नहीं चाहिए” (18.48)। यहाँ ‘सहज कर्म’ का अर्थ हमारे स्वाभाविक कर्तव्यों से लिया गया है। एक अन्य दृष्टि से, इसका अर्थ ‘अस्तित्व से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाले कर्मों’ से भी लगाया जा सकता है। चाहे कोई भी अर्थ लिया जाए, श्रीकृष्ण का निष्कर्ष यह है कि प्रत्येक कर्म किसी न किसी दोष से युक्त होता है। इसका तात्पर्य यह है कि कोई भी कर्म पूर्णता का पर्याय नहीं होता। श्रीकृष्ण ने कर्म के संदर्भ में अनेक शब्दों का प्रयोग किया है -जैसे अकर्म, विकर्म, और नियत कर्म । परंतु उन्होंने कहीं भी ‘शुद्ध कर्म’ करने की सलाह नहीं दी क्योंकि सभी कर्म किसी न किसी प्रकार के दोष से युक्त होते हैं। उदाहरण के लिए हमारा प्रतिरक्षा तंत्र (immune system) प्रतिदिन अनगिनत विषाणुओं और जीवाणुओं को नष्ट कर हमें रोगों से बचाता है। यदि ‘हिंसा’ को स्वभावतः अशुद्ध माना जाए तो जीवित रहना स्वयं ही अशुद्ध कर्म बन जाता है। इस प्रकार, हमारे अशुद्ध अस्तित्व द्वारा किया गया कोई भी कर्म अनिवार्य रूप से अशुद्ध ही होगा। यही…

Episodes

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247. सभी कर्म दोषयुक्त हैं

श्रीकृष्ण कहते हैं “प्रत्येक कर्म में कुछ न कुछ दोष अवश्य होता है, जैसे अग्नि धुएँ से आच्छादित होती है; अतः सहज कर्मों को त्यागना नहीं चाहिए” (18.48)। यहाँ ‘सहज कर्म’ का अर्थ हमारे स्वाभाविक कर्तव्यों से लिया गया है। एक अन्य दृष्टि से, इसका अर्थ ‘अस्तित्व से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाले कर्मों’ से भी लगाया जा सकता है। चाहे कोई भी अर्थ लिया जाए, श्रीकृष्ण का निष्कर्ष यह है कि प्रत्येक कर्म किसी न किसी दोष से युक्त होता है। इसका तात्पर्य यह है कि कोई भी कर्म पूर्णता का पर्याय नहीं होता। श्रीकृष्ण ने कर्म के संदर्भ में अनेक शब्दों का प्रयोग किया है -जैसे अकर्म, विकर्म, और नियत कर्म । परंतु उन्होंने कहीं भी ‘शुद्ध कर्म’ करने की सलाह नहीं दी क्योंकि सभी कर्म किसी न किसी प्रकार के दोष से युक्त होते हैं। उदाहरण के लिए हमारा प्रतिरक्षा तंत्र (immune system) प्रतिदिन अनगिनत विषाणुओं और जीवाणुओं को नष्ट कर हमें रोगों से बचाता है। यदि ‘हिंसा’ को स्वभावतः अशुद्ध माना जाए तो जीवित रहना स्वयं ही अशुद्ध कर्म बन जाता है। इस प्रकार, हमारे अशुद्ध अस्तित्व द्वारा किया गया कोई भी कर्म अनिवार्य रूप से अशुद्ध ही होगा। यही…

19 Oct 2026
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246. एक साधे सब सधै

कहा जाता है कि सृष्टि मात्र एक लीला (दैवी खेल) है और इस खेल को रोचक बनाए रखने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। जैसे फुटबॉल के खेल में यदि गोलपोस्ट बहुत छोटा या बहुत बड़ा हो जाए तो खेल का रोमांच समाप्त हो जाता है। उसी प्रकार, जन्म के बाद मृत्यु का आना, विभाजन या पृथक्करण का होना -ये सभी सृष्टि के ऐसे रोचक नियम हैं जिन्होंने जीवन के विकास में योगदान दिया और अंततः हमारे जैसे जटिल जीवन-रूपों का निर्माण हुआ। ये विभाजन व्यक्तिगत और सामाजिक, दोनों स्तरों पर विद्यमान हैं -जैसे जाति, धर्म, नस्ल, आर्थिक स्थिति आदि के आधार पर -और ये हमें जीवन के आरंभिक चरण में ही प्रभावित कर देते हैं। चुनौती यह है कि हम इन विभाजनों से ऊपर उठें और इस दिशा में श्रीमद्भगवद्गीता हमारा पथ-प्रदर्शन करती है। ऐसी ही एक विधि है स्वकर्म के प्रति समर्पण। इसी संदर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं“अपने स्वकर्म के प्रति समर्पण से मनुष्य सिद्धि (पूर्णता यामुक्ति) को प्राप्त करता है क्योंकि यह समर्पण उसी की पूजा है, जिससे सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण सृष्टि व्याप्त है” (18.45-18.46)। यह निरन्तर सीखते रहने की प्रक्रिया है, जब तक हम इस…

14 Oct 2026
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245. कर्म ही पूजा है

सामाजिक वर्गीकरण और उनसे संबंधित कर्मों को उनकी प्रकृति से उत्पन्न गुणों के आधार पर समझना भगवद्गीता के सबसे जटिल पहलुओं में से एक है। यह कठिनाई इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि हम किसी न किसी वर्ण के साथ गहराई से अपनी पहचान जोड़ लेते हैं। निम्नलिखित श्लोक यह स्पष्ट करते हैं कि वर्ण न तो श्रेणीबद्ध हैं और न ही किसी एक को श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए कर्मों में सिद्धि (पूर्णता या मुक्ति) प्राप्त करने की समान क्षमता होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं “स्वकर्म के प्रति समर्पण से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है क्योंकि यह समर्पण उसी परमेश्वर की पूजा है, जिससे सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण सृष्टि व्यापी हुई है” (18.45-18.46)। श्रीकृष्ण ने पहले स्वधर्म (अपने स्वभाव या प्रकृति) की बात की थी और अब वे स्वकर्म का उल्लेख करते हैं। मूलतः, स्वकर्म स्वधर्म से ही उत्पन्न होता है। आज के संदर्भ में, लगभग सभी संस्कृतियों और समाजों में कुछ व्यवसाय -जैसे खेल, अभिनय और गायन -अन्य व्यवसायों की तुलना में अधिक प्रशंसनीय हैं। इसी प्रकार प्राचीन काल में भी महत्व का निर्धारण अन्य मानकों से…

05 Oct 2026
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244. वर्गीकरण की विशेषताएँ

जीवन का विकास, विभाजनों और भिन्नताओं का परिणाम है। किंतुइन विभाजनों के पीछे एक ‘एकत्व’ विद्यमान है जैसे विभिन्न मोतियों को एक सूत्र में पिरोने वाला अदृश्य धागा (7.7)। उद्देश्य यह है कि हम अपने चारों ओर दिखाई देने वाले अव्यवहारिक और तर्कहीन विभाजनों के मध्य उस ‘एकत्व’को अनुभव करने की क्षमता विकसित करें। यह क्षमता ‘एकत्व’ की जागरूकता और अपने कर्मों में संतुलन स्थापित करने के माध्यम से विकसित की जा सकती है (2.38, 6.16)। श्रीकृष्ण ने गुणों और कर्मों के आधार पर समाज के चार वर्गों का उल्लेख किया है। वे कहते हैं “शांति, आत्म-संयम, तपस्या, पवित्रता, धैर्य, सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विवेक और आस्था; ये सब गुण ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक गुण हैं (18.42)। पराक्रम, शक्ति, धैर्य, कौशल, युद्ध से पीछे न हटना, दानशीलता और नेतृत्व क्षमता; ये क्षत्रियों के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक कर्महैं (18.43)। कृषि, गोपालन और वाणिज्य; ये वैश्यों के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक कर्म हैं। सेवा से संबंधित कार्य शूद्रों के स्वाभाविक कर्म हैं”(18.44)। ये वर्गीकरण न तो जन्म पर आधारित हैं, न ही इनमें कोई श्रेणीभेदहै, और न ही ये किसी की…

30 Sep 2026
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243. गुण ही विभाजन का कारण हैं

श्रीकृष्ण कहते हैं “मैंने गुणों और कर्मों के भेद के अनुसार चार वर्णों (विभाजनों) की रचना की है; परंतु मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो (4.13)। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र -ये सब अपने-अपने स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसारकर्म करते हैं” (18.41)। पहली बात, हमारा विभाजनकारी मन हमारे चारों ओर श्रेणियाँ बना लेता है। दूसरी बात, असत्य वास्तव में एक विकृत सत्य के सिवा कुछ नहीं है। इन दोनों के मिलन से यह असत्य धारणा बनी कि सामाजिक वर्ग जन्म पर आधारित और श्रेणीबद्ध हैं। परंतु सच्चाई यह है कि मनुष्य उनके गुणों और कर्मों के कारण चार प्रकार के होते हैं। इसके अतिरिक्त, यह विभाजन किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करने का मापदंड नहीं है। वर्णों या जातियों से संबंधित श्लोकों को समझते समय इन तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिए क्योंकि वर्ण और जाति आज भी हमारे सामाजिक और राजनीतिक ढांचे पर प्रभाव डालते हैं। गुणों का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं “सत्व, रजस् और तमस् -ये तीन गुण आत्मा को शरीर से बाँधते हैं (14.5)। सत्व ज्ञान के प्रति आसक्ति के माध्यम से बाँधता है (14.6)। रजस् जीवात्मा को कर्म के प्रति आसक्ति से बाँधता है (14.7)। तमस्…

27 Sep 2026