Bhagavad Gita (Hindi)

Bhagavad Gita (Hindi)

Bhagavad Gita
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Episode's summary

Class on Bhagavad Gita Chapter 5 Shloka 2

Episodes

23-

Bhagavad Gita 5.2

Class on Bhagavad Gita Chapter 5 Shloka 2

22 Nov 2022
22-

Bhagavad Gita 5.3

Bhagavad Gita Chapter 5 Text 3

26 Nov 2022
21-

Bhagavad Gita 5.4-5

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09 Dec 2022
20-

Bhagavad Gita 5.6

Bhagavad Gita 5.6 in Hindi अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 6 संन्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगतः | योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति || ६ || संन्यासः – संन्यास आश्रम; तु – लेकिन; महाबाहो – हे बलिष्ठ भुजाओं वाले; दुःखम् – दुख; आप्तुम् – से प्रभावित; अयोगतः – भक्ति के बिना; योग-युक्तः – भक्ति में लगा हुआ; मुनिः – चिन्तक; ब्रह्म – परमेश्र्वर को; न चिरेण – शीघ्र ही; अधिगच्छति – प्राप्त करता है | भावार्थ भक्ति में लगे बिना केवल समस्त कर्मों का परित्याग करने से कोई सुखी नहीं बन सकता | परन्तु भक्ति में लगा हुआ विचारवान व्यक्ति शीघ्र ही परमेश्र्वर को प्राप्त कर लेता है | तात्पर्य संन्यासी दो प्रकार के होते हैं | मायावादी संन्यासी सांख्यदर्शन के अध्ययन में लगे रहते हैं तथा वैष्णव संन्यासी वेदान्त सूत्रों के यथार्थ भाष्य भागवत-दर्शन के अध्ययन में लगे रहते हैं | मायावादी संन्यासी भी वेदान्त सूत्रों का अध्ययन करते हैं, किन्तु वे शंकराचार्य द्वारा प्रणीत शारीरिक भाष्य का उपयोग करता हैं |भागवत सम्प्रदाय के छात्र पांचरा त्रिकी विधि से भगवान् की भक्ति करने में लगे रहते हैं | अतः वैष्णव संन्यासियों…

10 Dec 2022
19-

Bhagavad Gita 5.7

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 7 अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म श्लोक 5 . 7 योगयुक्तो विश्रुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः | सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते || ७ || योग-युक्तः – भक्ति में लगे हुए; विशुद्ध-आत्मा – शुद्ध आत्मा; विजित-आत्मा – आत्म-संयमी; जित-इन्द्रियः – इन्द्रियों को जितने वाला; सर्व-भूत – समस्त जीवों के प्रति; आत्म-भूत-आत्मा – दयालु; कुर्वन् अपि – कर्म में लगे रहकर भी; न – कभी नहीं; लिप्यते – बँधता है | भावार्थ जो भक्तिभाव में कर्म करता है, जो विशुद्ध आत्मा है और अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में रखता है, वह सबों को प्रिय होता है और सभी लोग उसे प्रिय होते हैं | ऐसा व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कभी नहीं बँधता | तात्पर्य जो कृष्णभावनामृत के कारण मुक्तिपथ पर है वह प्रत्येक जीव को प्रिय होता है और प्रत्येक जीव उसके लिए प्यारा है | यह कृष्णभावनामृत के कारण होता है | ऐसा व्यक्ति किसी भी जीव को कृष्ण के पृथक् नहीं सोच पाता, जिस प्रकार वृक्ष की पत्तियाँ तथा टहनियाँ वृक्ष से भिन्न नहीं होती | वह भलीभाँति जानता है कि वृक्ष की पत्तियाँ तथा टहनियाँ वृक्ष से भिन्न नहीं होतीं | वह भलीभाँति…

19 Dec 2022